गोल मटोल बच्चे देखने में प्यारे और खूबसूरत दिखते हैं, उनकी गदराई हुई बॉडी सबको अपनी तरफ आकर्षित करती है। अक्सर हम बच्चों के भारीपन को ‘हेल्दी’ समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन चिकित्सा विज्ञान में इसे ‘चाइल्डहुड ओबेसिटी’ के खतरे के रूप में देखा जाता है। आंकड़ों की मानें तो 20 से 25% स्कूली बच्चे ओवरवेट या मोटापे से ग्रस्त है, लगभग 15% बच्चों में फैटी लिवर के शुरुआती संकेत देखने को मिलते है।

फोर्टिस हॉस्पिटल, शालीमार बाग, दिल्ली में पीडियाट्रिक्स में सीनियर डायरेक्टर एवं यूनिट हेड डॉ. जैन ने बताया हाल ही में उनके पास एक ऐसा मामला आया जिसमें एक दस साल का बच्चा जिसकी लंबाई  4 फीट 6 इंच थी और वजन 46 वजन था। बच्चा डॉक्टर के पास थकान, घुटनों में दर्द और शारीरिक गतिविधियों में भाग नहीं लेने की कंप्लेन लेकर आया था।

बच्चे ने बताया वो दोस्तों के साथ दौड़ना चाहता है लेकिन वो दौड़ नहीं पाता। वो सुस्त हो रहा है और वो बच्चों के साथ उनकी जैसे गतिविधियों में भाग नहीं लेता इसलिए उसने दोस्तों से खुद को अलग-थलग कर लिया है। एक्सपर्ट ने बताया बच्चे का बॉडी मास इंडेक्स (BMI) लगभग 25 था। उसकी उम्र के हिसाब से ये 95वें परसेंट से ऊपर था, यानी वो मोटापे (Obese) की श्रेणी में आता था। सरल शब्दों में उसका BMI सामान्य सीमा से 20–25% ज्यादा था। आइए एक्पर्ट से जानते हैं कि बच्चे के मोटापा का क्या कारण है और मोटापा से बचाव के लिए बच्चों की हाइट कैसी होनी चाहिए।

बच्चों के मोटापा के लिए कौन से कारण हैं जिम्मेदार?

बच्चों में मोटापा के लिए उनकी डाइट और बॉडी एक्टिविटी जिम्मेदार होती है। डाइट में  ब्रेड, सैंडविच, नूडल्स, चिप्स, सोडा, बर्गर और प्रोसेस्ड स्नैक्स बढ़ते मोटापा की वजह होता है। बच्चे का दस साल की उम्र में 46 किलों वजन इस डाइट की वजह से ही हुआ था। बच्चा ये चीजें कभी-कभार खाने की बजाय रोजमर्रा की डाइट में लेता था।

कौन से फूड्स बच्चों का मोटापा के लिए हैं जिम्मेदार?

शहरी बच्चों की आम डाइट में सुबह से लेकर रात तक के खाने का पैटर्न बिगड़ा हुआ है। बच्चे सुबह के नाश्ते में व्हाइट ब्रेड सैंडविच, पैकेज्ड सीरियल या बिस्कुट, मीठा दूध,चिप्स, नमकीन, क्रीम बिस्किट,इंस्टेंट नूडल्स, पिज्जा, बर्गर, पैकेज्ड स्नैक्स, मीठे पेय, पेस्ट्री,रिफाइंड आटे की रोटी, बाहर का खाना या रेडी-टू-ईट फूड का सेवन करते हैं जो बच्चों के मोटापा के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। एक्सपर्ट के मुताबिक बच्चों की पूरे दिन की डाइट में रिफाइंड कार्ब्स, अनहेल्दी फैट, नमक और शुगर ज्यादा होती है, जबकि फाइबर, प्रोटीन और जरूरी पोषक तत्वों की कमी होती है जिसकी वजह से बच्चे मोटापा के शिकार होते हैं।

बचपन का मोटापा कैसे गंभीर बीमारियों की शुरुआत है?

बचपन में पेट की चर्बी (Belly Fat) बढ़ती है, जो लिवर और पैंक्रियास को प्रभावित करती है। इस उम्र में मोटापा बढ़ने से इंसुलिन रेजिस्टेंस (Insulin Resistance) की समस्या शुरू होती है। बढ़ता मोटापा फैटी लिवर रोग का खतरा बढ़ा सकता है। बढ़ते मोटापा की वजह से कोलेस्ट्रॉल असंतुलन यानी ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ना, HDL कम होने जैसी समस्या हो सकती है। मोटापा हाई ब्लड प्रेशर की बीमारी का भी कारण बन सकता है। बढ़ते मोटापा को कंट्रोल नहीं किया जाए तो ये परेशानी आगे चलकर टाइप 2 डायबिटीज और दिल की बीमारियों का कारण बन सकती है। घुटनों पर दबाव बढ़ने से चलने में भी दर्द हो सकता है, जिससे बच्चा एक्सरसाइज से बचने लगता है। इससे उसकी शारीरिक और मानसिक सेहत दोनों प्रभावित होती हैं।

10 साल के बच्चे ने कैसे किया अपना वजन कंट्रोल

परिवार ने सख्त डाइटिंग की बजाय संतुलन अपनाकर अपने बच्चे का वजह कंट्रोल किया। बच्चे को 90% खाना घर का खिलाया गया। वजन कंट्रोल करने के लिए बच्चे की डाइट में दाल, रोटी और सब्जी को शामिल किया। बच्चे को घर के खाने पर मूव करके फैमिली ने जंक फूड को धीरे-धीरे स्किप किया। बच्चे के टेस्ट को घर के खाने पर सेट करने के लिए सलाद को स्वादिष्ट बनाने के लिए पिज्जा मसाले का इस्तेमाल किया ताकि बच्चा अपने टेस्ट के मुताबिक घर का खाना शौक से खा सके। स्नैक्स में फल, दही और थोड़ा चीज को भी शामिल किया गया। सोडा की जगह इन्फ्यूज्ड पानी का सेवन किया गया।

फैमिली की मदद से बच्चे का 6 महीने में 47 किलो से वजन घटकर 40 किलो रह गया। डाइट के साथ ही बच्चे की लंबाई 137 से बढ़कर 142 सेमी हो गई। बच्चे का BMI 25 से घटकर 19.8 तक पहुंच गया जो नॉर्मल है। वजन कम होने से बच्चे के एनर्जी लेवल में सुधार हुआ साथ ही बच्चे का कॉन्फिडेंस भी इंप्रूव हुआ।

बच्चों का मोटापा कंट्रोल रखना है तो शुरू से अपनाएं ये टिप्स 

  • पहले 2 साल बच्चों को चीनी से दूर रखें।  शुरुआती 1000 दिनों में सही पोषण बच्चे को भविष्य में होने वाली बीमारियों से बचाता है।
  • बच्चों को पोषक तत्वों से भरपूर खाना दें, खाली कैलोरी नहीं दें।
  • बच्चे को रोज़ 1 घंटा बाहर खेलने का मौका दें।
  • स्क्रीन टाइम कम करें
  • खाने, सोने और पढ़ाई का नियमित समय तय करें

डिस्क्लेमर

यह लेख केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई सलाह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय परामर्श (Medical Advice) का विकल्प नहीं है। बच्चों की डाइट, वजन या स्वास्थ्य से जुड़ी किसी भी समस्या के लिए डॉक्टर या योग्य न्यूट्रिशन एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी है। हर बच्चे की शारीरिक जरूरतें अलग होती हैं, इसलिए किसी भी बदलाव को अपनाने से पहले विशेषज्ञ की राय अवश्य लें।